Tuesday, July 12, 2011

अंधी बारिश

ये बारिश भी ना....... अंधी होती है.......


कभी छिटें तो कभी आंधी होती है.......

हर साल बिना थके गिरती रहती है...

 
जब भी बारिश की बुंदे मिलती है


प्यासी जमीं से....तब बारिश को

उसकी आंखो की रोशनी मिलती है....

फिर शुरु होती है.... बारिश की नयी ज़िंदगी...

 
जो मिट्टी की खुशबू आती है बारिशों में...



दरअसल में वो मिट्टी की खुशबू नहीं....


बल्कि बारिशों की धडकने होती है....


जो मिट्टी से मिल जाती है...


और फिर सौंधी सौंधी खुशबू


सारे मंज़र में मिल जाती है.....


"प्यासी जमीं और उसपर अंधी बारिश की छिटें....



मौसम का करवट बदलना याद आता है....."


पिछले साल की बारिश याद आती है मुझे...


और मेरे मकान के सामने के वो हरे भरे

लहलहाते खेत मज़े से झुलते थे......

वो मंज़र याद आता है मुझे....

 
इस साल भी बारिश हुई..... मगर......


वो अंधी बुंदे उस बंज़र जमीं पर गिरी....

मगर इस बार बारिश को आंखो की रोशनी..........

 
न मिल पायी..........
 
 
बारिश अंधी आयी थी..... अंधी गिरी थी......


लडखडाती... गिरती....संभलती.... गिरे जा रही थी....

मगर उसे उसकी आंखो की रोशनी न मिल पायी....

 
इस साल उन खेतो की जगह......


आदमज़ात की प्यास ने ले ली थी......

हरी-भरी सांसो का गला घोंटकर.....

सिमेंट की जान डाली थी.....

 
वो सौंधी खुशबू इस बार नही आयी....


बारिश को नयी ज़िंदगी न मिल पायी....



अंधी बारिश.... उसके अंधे आंसु....

प्यासी आदमज़ात.....उसके प्यासे ख्वाब.....

 
बारिश इस बरस प्यासी ही रह गयी....



और आदमज़ात अंधी होती चली गयी....






----------आलमगीर.

Saturday, June 18, 2011

बुंदो की बातें

दो बुंदे निकली खुद को आँधीयों से बचाते


कुछ बदमाश बादलो से खुद को छुपाते

आसमाँ के नज़ारे का लुत्फ़ उठाते

धरती की ओर चली धम से गिरने के लिये॥



एक बुंद बोली," इतनी मायुस क्यों है तु?"

दुसरी बोली,"खुद से गुफ़्तगू थोडी कर लुं"

पहली बोली,"तो अपने आप से क्यों, मै हुँ ना यहाँ?"

दुसरी बोली,"बस थोडी ही देर है,फिर मैं कहाँ और तु कहाँ?"

पहली बोली,"हमारी तो सदियों से यहीं दास्तां है।

कुछ पल यहाँ पनप के धरती से मिल जाना है।"



दुसरी बोली,"जब बदमाश बादलो का पेट फ़टता है

तब मुझे ज़रा डर सा लगता है!!!

तब आ जाती है वो घडी, मरने मिटने की,

खुद को धरती की ओर घसिटने की।"



पहली बोली,"अरे पगली, तु बेवज़ह इतना डरती है,

थोडा इसके बारे में क्यों विचार नहीं करती है?

क्या हुआ हम सिर्फ़ बुंदे है अगर?

धरती पे हमें सब जीवन कहते है मगर।

हमारा खुद का भी वजूद होता है,

कहीं बुंद तो कहीं सागर का रुप होता है।"



दुसरी बोली,"तुने मेरे दिल का डर निकाल दिया,

मुझे सोचने का नज़रिया बेमिसाल दिया।"



पहली बोली," हमारे गिरने का क्या राज़ है?"

दुसरी बोली,"कुछ नही,कुदरत का रिवाज़ है।"





पहली बोली,"यही तो!!!!!!! ज़रा नज़रिये को बदलो।"

थोडा ज़िंदगी का अलग रंग भी चख लो।

अगर तु किसी बंजर ज़मीं पर गिर जाओ तो क्या हो?

किसी प्रेमी युगुल के बदन को ठंडक पहुचाओ तो क्या हो?

किसी नन्हे हाथ पर हलके से फ़िसल जाओ तो क्या हो?

किसी तितली के रंगीन परो पे छिडक जाओ तो क्या हो?"



दुसरी बोली," हमारी ज़िंदगी इतनी हसीं भी है!!!!

बस मुझमें थोडी अकल की कमी सी है!!!!

अब मुझे सिर्फ़ एक ही काम करना है,

जल्दी से ज़मीं पे झुमके गिरना है।

फिर उसके बाद मुझे फ़िरसे बाफ़ होना है,

और फ़िर एक बार बुंद का जन्म लेना है।"





---------आलमगीर.



Wednesday, June 8, 2011

आबाद-गली-2

१.




अब "जनाब" उस आबाद-गली में

अपनी बरबादी का जश्न मनाते हुए चलने लगे....

उनकी वो "चुर्राहट" अभी भी थी..... मगर

उसमें वो "बादशाहत" नही रही......



वो मजबूर कदम भी अब इस "बरबाद" "जनाब"

पर हँसने लगते..... उनको देखते........

"जनाब" की गर्दन शर्म से झुक जाती और....







दुसरे ही पल में...... "जनाब" चिख उठते....









"जवां हुस्न पे अच्छी नही इतनी मगरूरी,

आखिर यही है तेरी इक अपनी मजबूरी।"





अब "जनाब" खिलखिलाके हँसने लगे.......

किसी पुराने दर्द की बाढ में बहने लगे.....



....



२.


"सुना था उसे लोग आँख भर के देखा करते है

पर उसकी गली में आज हमें वो अनदेखा करते है॥"



"जनाब" मैखाने में बैठे अपने दिल की बातें करतें......

कुछ मतलब-परस्त लोग उनके दर्द का मज़ाक उडाते....



ये तो अब रोज़मर्रा होने लगा था.......

"जनाब" दिल फुट फुट कर रोने लगा था....

रोज़ उस गली में आते नए-नवेले "नवाब",

और उनमें खुद को देखा करते ये फ़टे-पुराने "जनाब"........



ये सिलसिला हर रोज चलता रहा......

"जनाब" का दिल कतरा कतरा जलता रहा.....



....

 
३.


"और "फ़राज़" कितनी मिन्नते करवाएगा अब हमसे??

अब तो खुदा ने भी "आमिन" कह दिया॥"



ये "फ़राज़" की दर्ख्वास्त सुनते ही..........



"जनाब" की आँखो में अजीब सी चमक दिखने लगी...

कुछ एक पुरानी सी जख्म अब नए सिरे से बहने लगी...





"ए,"नवाब" मत सुनना उसकी मिन्नतों को तु,

ये खुबसुरत जहर है, पी ले तो जान जाती है॥"



मगर वो "नवाब" भी ............





"जनाब" के नक्षे कदम पर चल दिया.......





और.......





"जनाब" को खुद का एक हमशक्ल मिल गया......





....

 
४.


"संभलने दे हमें ए नाउम्मीदी, क्या कयामत है

ज़िंदगी की उम्मीद न रही,पर मौत सलामत है॥"





उसी आबाद गली के उसी चौक पर "जनाब",

अपना साज-ओ-सामां(भंगार) के साथ बिखरे थे....

वो अधनंगा मुछ्छड "जनाब" की हालत पे हँसता था....

भुखा ज़िना अब भी रेंगते हुए ही आता,पर उसपर

वो "चुर्राहट" नही थी.... जो किसी ज़माने में उसी

ज़िने की शान हुआ करती थी।





लेकिन उस इमारत से मजबूर कदम अब भी

थिरकतें,और"वाह-वाहयी" में मदहोश होते थे कई

और "जनाब".........





"मेहफ़िल-ए-ज़िंदगी में हम तो बरबाद हुए

अब आबाद गली में मौत का जश्न मनाएंगे॥"





 

"जनाब" अपने ही अंदाज़ में अपनी ही ज़िंदगी

का तमाशा लिखते लिखते सो गए।

....

 
५.




"गुज़री रात ने कुछ इस तरह अंगडाई ली,

सवेरा भी करवटों में फ़ँसा फ़ँसा सा हुआ॥"





उस सुस्त माहौल में.... उस आबाद गली के चौक पे...

"जनाब" आराम फ़र्मा रहे थे.....थोडी चहलपहल हुई...

वो अधनंगा मुछ्छड "महाराज" भी अपने ठेले पे आया....

और जलेबी निकालने की तैय्यारी करने लग गया.....



"महाराज" ने एक दफ़ा "जनाब" की जानिब देखा...

और फिर अपना हाथ चलाते जलेबी के भँवर में

मसरुफ़ हुआ......



दिन चढकर आया........ मगर अभी भी........









"जनाब"









आराम ही फ़र्मा रहे थे....









ये नज़ारा कुछ अज़ीब था......

"गली-आबाद" के लिये......







वो मुछ्छड "महाराज" चौंका..... और बोला...









"तुम जब "जनाब" थे, तब "चुर्राहट" से खिलती थी गली

पर अब... तेरे मौत पे कोई बवाल न हुआ॥"











"जनाब" का ज़नाज़ा न निकला.......

बस उनके उम्र का तकाज़ा निकल गया.....











उनकी "मौत" के साथ।





"जनाब" आबाद हुए हमेशा के लिये











उसी "आबाद-गली" के चौक पर........



------आलमगीर.

Saturday, May 21, 2011

बाबा


परवा घरी गेलो होतो.... हो हल्ली मी वेगळा राहतो. कारणं तिच नेहमीचीच,सासवा-सुनांच पटत नाही, म्हणुन भांड्याला भांड लागायला नको आणि आवाज व्हायला नको, म्हणुन वेगळं राहण्याचा मनाला तितकासा "न" रुचणारा उपाय. ही सासवा-सुनांचं नाती साक्षात परमेश्वराला सुद्धा कळणार नाहीत.असो, तर सांगायचा मुद्दा इथे वेगळाच आहे. मुद्दा म्हणजे," बाबा".



बाबा म्हणजे अजब रसायन आहे.अगदी शहाळ्यासारखे गुणधर्म. बाहेरुन कडक आणि आतुन मुलायम आणि गोड. पण हा मुलायमपणा आणि गोडवा सहजासहजी अनुभवता येत नाही. तसं बाबांच्या व्याख्येत बसत नसावं कदाचित. बाबा म्हणजे नेहमीच कडक आणि ज्यांची कायम भितीच वाटावी असं व्यक्तिमत्व. मलाही भिती वाटते बाबांची अजुनही,हे थोडं हास्यास्पद वाटेल, पण वाटलं तर वाटुदे. बाबांची भिती असली की एक आधार वाटतो मनाला कुणीतरी भक्कम पाठीशी उभं असल्याचा. अर्थात हा आधार व्यक्तीसापेक्ष आहे. कुणाला भिती रुपी आधार वाटतो, तर कुणाला प्रेमाच्या रुपात. पण आधार हा असतोच. जसं जसं माझं वय वाढत गेलं तसं तसं बाबांच्या व्यक्तिमत्वाचे अनेक पैलु उघडकीस आले.



हे "बाबा" लोक आपल्या खर्या रुपाचा थांगपत्ता लागु देत नाहीत कधी, म्हणुनच ते "बाप" असतात. मुलगा घरी पार्टी करुन आला की बाबाच जागे असतात. हे असं माझ्या बाबतीत खुप वेळा झालंय,अर्थात मुलगा मोठा झाला हे सगळं ठीक आहे पण त्याला "त्या" अवस्थेत बघुन त्याना कळतं की मुलगा काय करतोय ते... म्हणजे मुलगा पार्टी करतोय की पार्ट्या झोडतोय. ह्यातला फ़रक त्यांना नेमका ठाऊक असतो,भले त्यांनी त्यांच्या उमेदीत पार्ट्या केल्या नसतीलही,पण हा फ़रक बाबाच ओळखु शकतात.



मुलगा जेव्हा खोटं बोलतो तेव्हा बाबांना सगळ्यात वाईट वाटतं,पण ते कधी वाईट वाटल्याचं सांगत नाहीत,पण त्यांचा अबोला सगळं काही सांगुन जातो. बाबांचे डोळे पाणावलेले बघुन काळीज हेलावुन जातं. बाबांसारखा भक्कम माणुस भावुकही होऊ शकतो हेच ह्यातुन दिसतं. मुलग्याने त्याच्या पहिल्या कंपनीत बक्षिस मिळवलं हे अगदी उत्साहाने सांगताना त्यांच्या डोळ्यात आनंदाश्रु येतात, पण मुलाला हे कधी कधी कळत नाही.


मुलगा प्रेम विवाह करणार असं कळल्यावर खरा त्याना आनंद होतो,पण त्यांच्या काही अपेक्षांना सुरुंग लागल्याचं दु:ख त्यांच्या चेहर्यावर जास्त दिसतं,त्यावेळी मुलगा प्रेमात आंधळा होतो आणि बाबा ...... छे, तो दिवस न आठवलेलाच बरा. सुन पसंतीची हवी ही छोटीशी अपेक्षाही मुलाने पुर्ण न केल्याचं दु:ख त्यांच्या वागण्यातुन दिसत असतं, पण त्यांच्या डोळ्यात मात्र "मुलगा आनंदी आहे" ह्याचच समाधान दिसतं.मुलगा-सुन सुखाने राहावीत हिच त्यांची इच्छा असते.



परवा आई-बाबाना भेटायला गेलो, तेव्हा निघताना "अच्छा" केला आम्ही दोघानी, तर चक्क बाबानी आम्हाला "अच्छा" केला. मी हिला म्हणालोही," बाबानी लहानपणी मला कधीही "अच्छा" केला नाही, पण आता अगदी आठवणीने करतायत." त्यांचे ते थकलेले हात बघुन आपण कुठेतरी चुकतोय ह्याची जाणिव मनाला चाटुन गेली. ते थकलेले हात हेच सांगत असतील कदाचित," लहानपणी अच्छा नाही केला म्हणुन आता उतारवयात ही पाळी आलीय माझ्यावर."



डोळ्यातले अश्रु संपतच नाहीयेत हे लिहिताना.





------------- आलमगीर.





आबाद-गली का किस्सा

१....


"सप्तरंग उधळुनी आज बराच काळ लोटला

वाट बघता तुझी,या मैफ़िलीचा प्राण आटला"



शौकीन लोगोंकी बस्ती की एक रंगीन गली

उस गली के बिलकुल बिचोबिच एक

दो-मंज़िला इमारत,गली जैसी ही रंगीन,कुछ गमगीन.....

उस इमारत के बेरुह कमरें में कुछ मजबूर कदम

साजो-सामां के साथ थिरकते रहते थे......

और "जनाब" के जुते चुर्रर्रर्र कर जमते थे.....



वो पहली पहल का जमना अब रोज़ाना हुआ

और अब रोज़ वो "चुर्राहट" सुनाई देने लगी.....

दिल जैसे रंगीन, बिलकुल वैसेही

मुँह में "बनारसी " पान उसे

और रंगीन बना देता......

और जैसे शाम ढलने लगती

"जनाब" का शौक रवानी पे होता.....





निचे,जलेबी निकालता हुआ एक अधनंगा मुछ्छड "महाराज"

बगल में उपर जाता हुआ भुखा-प्यासा, बेकल ज़ीना

(जो आते वक्त थकते,रेंगते हुए निचे आता था)



अंदर- शाही झुमर, पान की थाली

घुंगरुओ की आगोश में थिरकते पैर

साज़ में मस्त हुए कान

अश्रफ़ियों का मखमली थैला



"वाह-वाहयी" में मदहोश उठते हाथ और

वाहियात अमीरी और शौक की फ़र्माइशोपे

कुछ मजबूर जिस्मों की नुमाईश.....





.....

२...

"आलाच आहेस तर, घे क्षणभर तु विसावा

लपतील इशारे परी, इरादा नजरेत दिसावा"



और फिर वोही "बनारसी" पान की रंगत

अपने "इरादे" छुपाती अपनी रंगत उसके

गाल पर छोड जाती.....



मेहफ़िल की आगाज़ तो सबके लिये होती

मगर उसके आखरी पल सिर्फ़ उसीके लिये

इसिलिये गज़ल के दो पेहलु होते.....

एक वफ़ादार शौकिनो के लिये.....



और दुसरा(वफ़ा-ए-शौक खतम होने के बाद) इस शौकिन बेवफ़ा के लिये.......







"दिन सख्त "काफ़िये"सा, तजस्सुस बढाता रहा

रात शरिफ़ "रदिफ़" सी, वाह-वायत लेती गई।"

.....

३...

"आता नाही तर पुन्हा कधीच नाही

मग श्वास आणि आसवांना काय अर्थ??

.

.

.

प्रेत कधी रडत नाही आणि श्वास तर...."



एक दिन "जनाब" गुस्से में रहे बहोत,



"इथे भल्या भल्या "नशा" उतरतात माझ्या अदेने

मात्र तुझ्या रागाची "अदा" एकदम नशीली....."







"जनाब" गुस्से में ही, रेंगते ज़ीने से निचे उतरे....







"और "फ़राज़" कितनी मिन्नते करवाएगा अब हमसे??

के खुदा ने भी अब "आमिन" कह दिया॥







"उफ़्फ़ ये फ़राज़..." कहके







"ज़नाब" मुड गए....

.....

४...

एक रोज़ न थिरके मजबूर कदम

न जमी कोई बंदिश, न फ़ैली कोई

आधी कच्ची नज़्म, और न बही

कातिलाना गज़ल.....

"उसके" बेरुह कमरे में...









लेकिन शाम जवां हुई,रवानी चढी,

थिरके कुछ और मजबूर कदम

"उसीके" सामने उसकी दोस्त के....









"रात्रभर दाबलेले हुंदके आता दिवसाही टाहो फोडु लागलेत

कुणी म्हणतं," त्या सुरावटीत आता जादु राहिली नाही."







और उसी रेंगते,थके हुए ज़ीने से उतरे,













"जनाब"



......

५...

अब "जनाब" के पास अश्रफ़ियों का मखमली थैला न रहा

और मेहफ़िल में भी गज़ल का दुसरा पहलू न रहा...









फिर "जनाब" के लिये,







ज़ीनें से गुज़रते होनेवाली "चुर्राहट" गुनाह हो गया

अश्रफ़ियों की छनछनाहट न हुई तो भी गुनाह हो गया

दरवाज़े पे दस्तक देना भी एक गुनाह बन गया

उस ज़ीने के निचे सहमे हुए सुरावट सुनना भी गुनाह...









(छुपके सुन भी लेता मगर ऐसे मंज़र में

"वाह-वायी" दिल में की जाती है..... आसमां मे नहीं

कमज़र्फ़ कहींका!!!!)









कभी किसी गज़ल के शेर पर वो "चुर्राहट" बादशाहत थी

अब वो गली के कोने में फ़टी हालत में फ़ेंकी "किस्मत" थी।









उसके होटो को छुकर जो जाम उसके हाथ में आता था कभी...

आज उन्ही हाथो में......









उसी गलीसे...

फ़ेंके हुए कुछ जाम के टुकडे...

मसले हुए ज़र्द कुछ फुलो के गजरे...

वेहशी लोगो ने फुँके कुछ टुटे हुक्के...

फाडी हुई कुछ आधी अधुरी गज़लें....

















और कुछ ऐसेही शौकिनोका "फ़ेंका हुआ शौक"



.....

६...

"जनाब" उसी फ़ेंके हुए शौक को लेकर

उस लुच्ची गली के चौंक पे खडा......









"आसमंतात विहरे ती गज़ल माझीच आहे

काळजात पुरुन उरे ती ही गज़ल माझीच आहे"











ये सुनने के बाद, उसकी बेज़ार

खुली उंगलियाँ मुट्ठी बन जाती थी....













"गली आबाद" के छोर से

दुसरे छोर तक पहुँचने से पहले





"जनाब"













"...बघुया, कोण जास्त कमावतं??

ह्या भंगारवाल्याचं भंगार, की नाइलाजास्तव केलेला शृंगार....."



-----------------आलमगीर.





Saturday, April 23, 2011

उम्र अबके बरस ही सफ़ैद हो गयी

उम्र अबके बरस ही सफ़ैद हो गयी


अब वो बात कहाँ,वो मंजर फिर कहाँ

याद आते है वो दिन जब पुरी ज़िंदगी में

सिर्फ़ यार-दोस्त ही छाए रहते थे

अब वो जगह रोजमर्रा की आपाधापी

ले चुकी है,अब वो बात नही रही।

उम्र अबके बरस ही सफ़ैद हो गयी॥







तब युं होता था के दोस्तों के साथ

बिताए कुछ हसीं लम्हे

ज़िंदगी की वुसत भर देते थे

ज़िंदगी में थोडी सी मसर्रत भर देते थे,

लेकिन अब कुछ नए रिश्तें कुछ नयी

जिम्मेदारियो ने ज़िंदगी के साथ

रफ़ाकत करने की ठान ली है।

उम्र अबके बरस ही सफ़ैद हो गयी॥



आज ये एहसास हुआ के ज़िंदगी ने

एक नया रुख ले लिया है,

वो रुख,जिसकी मंज़िल न जाने कहाँ है???

मै उस रुख पर चल तो रहा हुँ

कुछ नए इरादो के साथ,कुछ नए

सपनो को हकिकत में बदलने

पर जरा सा दुर जाता हुँ,तो लगता है,

जैसे मेरी मंज़िल मुझसे दुर जा रही है

उम्र अबके बरस ही सफ़ैद हो गयी॥



लेकिन अब भी मेरे पलको पे

तैरते है वो हसीं लम्हे जो मैने

मेरे दोस्त-यारो के साथ बिताए थे

ये लम्हे कहीं गिर न जाये इसलिये

मै आजकल सोता नही हुँ।

अब वो बात कहाँ,वो मंज़र कहाँ??

उम्र अबके बरस ही सफ़ैद हो गयी॥



----------- आलमगीर.

मुझको भी कोई तरकिब सिखादे

मुझको भी कोई तरकिब सिखादे यार मेरे


अक्सर तुझको देखा है, मुस्कुराते हुए

खिलखिलाके हँसते हुए, लेकिन तेरी

हँसी में मिलावट नहीं देख सकता कोई

मुझको भी कोई तरकिब सिखादे यार मेरे।





जब पहले पहल तुझसे मिला था

तो ऐसा लगा था,जैसे एक खिलखिलाता

झरना बह रहा हो, फिर दिन गुजरते गए

और तुमसे बातें होने लगी,तब मुझे तुम

एक आबशार नजर आयी थी।

वो आबशार जो अपनी छिटों से

सारे जमीं को अपनी छिटों से

भिगो देता है और सारा मंज़र

उसके आगोश में आ जाता है।

तुम बिलकुल वैसी ही हो।





फिर और बातें हुई, एकाद मुलाकात भी

नसीब हुई, वोही आबशार तब एक समंदर

नज़र आया था मुझे।

तेरा चेहरा खिल तो रहा था

पर अब उसमें एक जर्फ़ दिखाई था।

तुम्हारी मुस्कुराहट में एक सुकुत नज़र

आया था मुझे।



इसलिये तुम्हारे लिये मेरी एक त्रिवेणी

दर्या का उछलना कुदना

समंदर का अजिब-ओ-गरिब सुकुत

.

.

.

जिसका जितना जर्फ़, उतना वो खामोश।"







तु इसी तरह से मेरी ज़िंदगी में शामिल

हो गई और फिर शुरु हुई,

अपने दोस्ती की दास्तां।

खुदा करे, ये सलामत रहे।







------ आलमगीर.

प्यार काँपता है हवस की वेहशी पकड से


प्यार काँपता है हवस की वेहशी पकड से,

बडे खौफ़ से तकता रहता है,

अब इस संगिन दौर में दिल से

मुलाकाते कम हो गई है।

जो ज़िंदगी दिलो की सोहबत में कटा करती थी

अब अक्सर हवस की दरिंदगी में मसल जाया करती है।

बडा सेहमा सा रहता है प्यार अब,

वो चांदनी राते न जाने कहाँ चली गयी।



जो किस्से वो मुकम्मल करता था,जिनके लतिफ़े

अब भी लोग सुनाते है।

जो मरासिम रिश्ते वो बनाता था,उन रिश्तो की

सारी गिरहे अब साफ़ नज़र आती है।

उनमें से कुछ खून से लतपत है, कुछ

टुटी हुई है,जुडने की कोशीश में रेंगती

नज़र आती है अब।



अब प्यार की पाकिज़गी नहीं रही, वो सिर्फ़

हवस की भूक मिटाने का ज़रिया बन गया है

अब किसी भी युगुल को इश्क फ़र्माते देख

अपनी पलको को मुंद लेता हुँ शर्म से।



कभी कॉलेज के कँटीन मे बैठ जाते थे

कभी समुंदर किनारे,कभी हसीं वादियों में

दिल से दिल मिला करते थे, और

मोहब्बत का मंज़र दिखाई देता था।

प्यार करने से,प्यार में दुनिया से लडने की

जो ताकत मिला करती थी अब उसका क्या होगा.....??



प्यार से ज़िंदगी में जीने का ज़ायका आता था,

पर अब कमसिन जवानी को बिना ज़ायके से

अपनी शरीर की भूक मिटाने की लत लगी है।

अब की नस्ल-ए-नौ को बडी जल्दी ही पैसो में

मश्गुल होने की आदत सी लगी है।

प्यार में दिल से दिल का जो ज़ाती राब्ता था

वो अब कट-सा गया है।



प्यार का इल्म अब बदल गया है,

अब प्रेमी युगुल तो दिखेंगे लेकिन,

वो "पाक" होगा या फिर और एक .............।



-----------------आलमगीर.











Tuesday, April 19, 2011

एक और ज़िंदगी जी लुँ

ज़िंदगी के इस मोड पे जरा सा


रुक जाता हुँ और सोचता हुँ,

"मै ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया"

पर इस हसीं सफ़र में कई ऐसे मोड आए

जो मुझे अपने ख्वाबो की याद दिलाते थे

वो ख्वाब मक्सूद हो चुके थे मेरी ज़िंदगी के

कुछ ख्वाब हकिकत बन गये,

कुछ किस्मत बन गये,

उन मोडोंने मुझे काफ़ी सिखाया

ज़िंदगी का साथ निभाना तो मैने

वही सिखा था।

कई दोस्त मिलें,और कारवाँ भी बना

मगर बारहा मुझे यही डर लगा रहता है

की,"इस कारवाँ मे मेरे ख्वाब कहीं खो न जाये"





अब कई जिम्मेदारियो को निभाते

ये कंधे थोडे कमजोर लगते है,

बेवक्त ही सही,लेकिन अब बुढापा

सामने नज़र आता है।

कभी लगता है इन सब चिजो को

छोडके कही अकेला निकल जाऊ

खुद की तलाश में,खुद के सपनो को

पुरा करने, सपनो को जीने,

पर यही सोचकर रुक जाता हुँ

की यहाँ मेरे लिये कई लोग

रुके है, मुझसे उम्मीद लगाये बैठे है।

उन्हे तनहा छोडकर,मै अपने ख्वाबो को

जीने के लिये जा सकता हुँ????





तो मै खुद से एक समझौता कर लेता हुँ

अपने ख्वाबो से जरा कहता हुँ

"अब न आया करो,थोडा काम बाकी है"

बस वो काम निपटालुँ तो चैन से

ख्वाबो के प्रपोजल पे एक बार गौर कर लुँ

सब लोगो ने मुझसे आस लगाई है

कुछ ने बुढापे के सहारे की

कुछ ने बचपन के दुलार की

कुछ ने पुरी ज़िंदगी के साथ की

और मैने इन सबको पुरा करने की

 

इस दौडते हुए लम्हो में,चंद फ़ुरसत के

लम्हो के लिये तरसता हुँ मै आजकल

चंद लम्हे मिल जाये,तो जो ख्वाब मैने और

मेरे लिये जिन्होने देखे थे,

उनसे जरा गुफ़्तगु कर लुँ

कुछ मेरे ख्वाबो की सुनु

कुछ मेरी जिम्मेदारीयो की....







जरा इस मसरुफ़ ज़िंदगी से

फ़ुरसत मिल जाए अगर....

तो मै और एक ज़िंदगी जी लुँ।



--------आलमगीर.

शायर

इस कदर शायर बनने की शिद्दतें मुसलसल थी


कुछ नज़्में दिल से निकलने को बेकल थी।



वो कलम की नज़ाकत,वो स्याही की अदा

उमराव जान के जरियेसे शहरयार की गज़ल थी।



कुछ कटे सर,खून से लतपत लाशें

वो गुलज़ार की "खराशें" दरअसल थी।



क्या तखल्लुस रखु मेरा, मगर जहन में

"फ़राज़" के कलम की चहलपहल थी।



मतलबी दुनिया के आसार दिखाए "तल्खियाँ" ने

ये तो साहिर ने इन्किलाब की उगाई फ़सल थी।



बहुत सी कोशिशे नाकाम हुई अब तक

न जाने इन शायरोंकी कौनसी नसल थी।



--------------------आलमगीर.

का मोगरा उशाला, तु माळतेस आता

का मोगरा उशाला, तु माळतेस आता


पाहुन आरशाला,का लाजतेस आता॥



गालांवरी बटांना,बेभान बागडु दे

केसात भाबड्याना,का सारतेस आता॥



तुझ्याच यौवनाचा,आम्हास हा सहारा

डोळ्यात बाण धरुनी,का मारतेस आता॥



ओठांतुनी तुझ्या ह्या,वाहे रसाळ प्याला

आहे अचुक संधी,का टाळतेस आता॥



त्यातुन तिळ बैसे,ओठांवरी कडेला

वाटे मला असुया,का हासतेस आता॥



------------------आलमगीर.


नज़्म

जब भी उन शायरो को पढता हुँ


तो अक्सर हैरान सा हो जाता हुँ

दिल से निकले अरमानो को

रस्म-ओ-रिवाजो में जकडा पाता हुँ।



क्या हुआ अगर दिल के अरमान

एक फ़ुव्वारे की तरह निकले

लेकिन इन्ही शायरोंको इसी

फ़ुव्वारे को अपने इशारो पे नचाते

देखकर मायुस हो जाता हुँ।



अरमानो का क्या है? वो तो बडे

मासुम होते है, वो बस उभरकर

आना जानते है,अब उन्हे उभरने

देना,या जकडना उस शायर की

जिम्मेदारी है।



एक दिन ऐसेही कुछ अरमानो को

लेकर बैठ गया मैं, कापी निकाली

और उन्हे उतारने लगा,उनमें से

कुछ मचलकर सामने आए,

कुछ दिल में ही रुठकर बैठ गए।



उन रुठे हुए अरमानो को मनाने

चला हुँ मैं,कई मिन्नते की,

पर वो कुछ भी सुनने की सुरत में

नही हैं। लगता है मेरी उन्हे उतारने

की बेपर्वाही पसंद नहीं।



इस संगिन दौर में,इंसान बडे

बेपर्वाह हो चले है, इसिलिये शायद

उनके अरमान भी उनसे नाराज है।



------------------आलमगीर.


असं नाही की,मी तुझ्यावर प्रेम करत नाही

असं नाही की,मी तुझ्यावर प्रेम करत नाही


मात्र भावनांची ती ओढ आता परत नाही॥



आता तुझी वाट बघण्याची विवंचना कसली??

जिथे तुझं आणि माझं आता पटत नाही॥



चेहर्यावर आता अवेळी सुरकुत्या पडल्या

हल्ली आरशात पाहिल्याचं मला स्मरत नाही॥



आता धावपळ करुन तुझी भेट नको मला

हे जिर्ण शरिर आता व्यर्थ धडपडत नाही॥



आता ह्या व्यर्थ जिवनाचे मी काय करु??

मरण्यावाचुन दुसरा पर्याय आता उरत नाही॥

जिस्म

मुझे मेरा जिस्म छोडकर आ गया इस दुनिया में


कुछ महिने पहले था मेरे साथ मेरी दुनिया में

भाग रहा था मैं जब,अपना वजूद बनाने के लिये

माँ की तहजीब मिल गयी,ये खोटा सिक्का चलाने के लिये।

 
मै हमेशा सोचता रहता था, बगैर मेरे वो


इस मतलबी दुनिया में कैसे जी पाएगा?

मतलब-परस्त लोगोसे लडते लडते

बेचारा,वो जीते-जी ही मर जाएगा।

 
अब इस दुनिया में आकर मुझे बुला रहा है


मानो, जैसे कोई नया ख्वाब दिखा रहा है।

उसने तो बडी जल्दी ही उसकी तहजीब सिख ली,

बडा ही मतलब-परस्त है वो,

मुझे उस दुनिया के उसूल सिखा रहा है।

 
मैं भी अपने उसूलो पे अडा रहा,


लेकिन वो अपनी आदमजात पे अडा रहा।

आखिर मैने ही तो मेरे जिस्म को उसूल सिखाए थे

उस दुनिया में जाके,उसने मुझे अपने रंग दिखाए थे।

 
उसने तो मेरे बगैर जिने का सलिका ढुंड लिया


ये देखके मैने तो अपनी पलको को मुंद लिया।

दिल मेरा अब ढुंडता है मेरे सबसे अज़िज़ को

मैने आदाब समझा उसके खुदा-हाफ़िज़ को।

 
शायद मैं तर्क-ए-उसूल कर,उसके हाथ थाम लुँ


और उसके साथ उस दुनिया के दो जाम लुँ।

लेकिन मेरा जिस्म भी बडे उसूलोवाला निकला

मुझपर मेरे उसूलो को लाद कर खुद चल निकला।

 
मुझे मेरा जिस्म छोडकर आ गया इस दुनिया में


कुछ महिने पहले था मेरे साथ, मेरी दुनिया में।





------------------आलमगीर.

Friday, March 25, 2011

चल सको तो ऐसी चाल चल जाना

चल सको तो ऐसी चाल चल जाना


मुझे पता भी न चले और तुम बदल जाना





ये कातिल अदाये तेरे हुस्न की क्या कहने

जाहिर है मेरी तबियत मचल जाना





तेरा गुस्सा जैसे कोई शोलों की लपेटे

हाय,तय था मेरा उसमें जल जाना





अभी अभी जो जुदाई की शाम आयी थी

कुछ अजिब लगा था जिंदगी का ढल जाना





अब तो सिर्फ हसीन यादें ही बची है

दिल ने अब सिख लिया है युंही बहल जाना





मौत आती है एक दुल्हन बनकर

शायरोने तो कब्र को भी महल जाना





हर कहानी में और इसमें काफी दर्द मिला

बहुत मुश्किल था इन सबसे संभल जाना





---------- आलमगीर.









अपने लबो पे सजाना चाहता हु

अपने लबो पे सजाना चाहता हु


मेरी जान,तुझे मै गाना चाहता हु






थक गया हु अब तेरे खयालोसे

हकिकत मे तुझे पाना चाहता हु





अब सारे मुहल्ले मे अंधेरा छा गया

रोशनी हो,घर जगमगाना चाहता हु





मेरी जरासी गुस्ताखी से नाराज हुए

एक मौका दो,मै मनाना चाहता हु





चंद अश्क गिराके तेरे दामन मे

उनको मै मोती बनाना चाहता हु





तेरे जाने पर ही आखरी हिचकी आए

मौत भी मै शायराना चाहता हु







-------- आलमगीर.

Saturday, January 15, 2011

नज़्म-२

मैने जो गीत लिखे थे तेरे प्यार की खातीर


उनको मै आज बाज़ार में ले आया हुँ।



जिन गीतो पे थी अपनी मोहब्बत की असास

उनकी आज ठेले पे बोली लगेगी।

मेरे अल्फ़ाज़,मेरी शायरी और मेरा एहसास

हर चिज़ तराज़ु में बैठ के बिकने लगेगी।



कुछ गीत तेरी जवानी के,कुछ तेरी ज़िंदगानी के

हर एक गीत आज निलाम होगा।

कुछ खरिदार की पसंद के,कुछ मेरी पसंद के

हर एक गीत पे मेरा सलाम होगा।



देख इस बिकाऊ दुनिया में ये आलम है

मेरे चंद नग्मे भी मेरे पास न रह सके।

तेरे वो जलवे किसी और की मिरास सही

तेरे कुछ खाके भी मेरे पास न रह सके।



मैने जो गीत लिखे थे तेरे प्यार की खातीर

उनको मै आज बाज़ार में ले आया हुँ ।

 
----------- आलमगीर.

नज़्म-१

इस भरी दुनिया में तुम मुझे बारहा मिली हो


चाहकर भी मैं अब मुस्कुरा सकता नहीं।

बस मायुसी मेरी फ़ितरत में दाखिल हो चुकी है

मै तेरे उस सवाल का जवाब दे सकता नहीं।



तुम मेरी होकर भी बेगाना ही पाओगी मुझको

तुम्हारा होकर भी तुझमें समा सकता नहीं।

रूहअफ़ज़ा है हमारे इश्क के नग्मे मगर

उन गाये हुए गीतो को अब मैं गा सकता नहीं।



तुमने मुझमे कौनसा हुनर देखा ए हसीं

मै तो खुद अपने भी कोई काम आ सकता नहीं।

दिल तुम्हारे प्यार की शिद्दत से वाकिफ़ तो है

पर हकिकत से मैं दामन चुरा सकता नहीं।



मैने देखी है प्यार की मेहफ़िल में शिकस्त बारहा

अब किसी तहरीक पर मैं गज़ल लिख सकता नहीं।

किस तरह मैं तुझको करु शरिक मेरी ज़िंदगी में

मैं तो खुद की ज़िंदगी का बोझ उठा सकता नहीं।

 
-------- आलमगीर.

जब कभी

जब कभी मेरे आँखो में नमी पायी गयी


हमारी मोहब्बत की कहानी दोहरायी गयी।



तेरे लब पराये हुए तो तुझे क्या शिकवा अगर

मेरी ज़िंदगानी मय के प्याले से बेहलायी गयी।



ए ज़ालिम तुझे क्या इल्म तेरे वास्ते

किन बहानो से तबियत राह पर लायी गयी।



दिल की धडकने अब दुरुस्त हो चली, खैर हो

मेरी नज़रे बुझ गयी या तेरी परछाई दिखाई गयी।



तुम्हारा तर्क-ए-वफ़ा एक अदा हुस्न की मगर

एक भुल हमारी हमें बारहा सुनवाई गयी।



उनका गम,उनका तसव्वुर,उनके शिकवे अब कहाँ

हमारी सारी हयात अश्को में बहायी गयी।



अब इन्सान पर तादिब के पेहरे है

कब फ़ितरत-ए-इन्सान को ज़ंज़ीर पहनायी गयी।



मेरे माज़ी में तेरा पेहरा था मगर

तेरी चाह फिर जाग उठी तो कैद सुनवाई गयी।

-------- आलमगीर.

रिटायर होने के बाद अब क्या??

सुबह अलार्म बजा

और मेरी निंद खुली

मगर फिर एहसास हुआ

की अब तो ७.५९ पकडनी नहीं।

बिस्तर में आँखे खुली रखके

सोचता हुँ मै!!!!

रिटायर होने के बाद अब क्या???



अब किसी चिज का इंतेज़ार न था

ज़िंदगी जैसे चैन से बिस्तर पे लेटी है

और बेझिझक

मगर

उस चैन की सांसो में और

दफ़्तर की भागदौड में काफ़ी फ़र्क है।



घर का सन्नाटा कभी मेहसूस नही किया था

घर की खामोशी कभी "अजि सुनते हो"

तो कभी"सरजी गुड मॉर्निंग"

कहके बुलाती है।



तनहाई ट्रॅक सुट और स्पोर्ट्स शुज

पहनकर मॉर्निंग वॉक पे निकल जाती है

और आते वक्त अखबार हाथ में

थमाकर चल देता है वो अखबारवाला....



रिटायर होने के बाद ज़िंदगी

एक अलग रुख लेती है।



------ आलमगीर.