कभी छिटें तो कभी आंधी होती है.......
हर साल बिना थके गिरती रहती है...
जब भी बारिश की बुंदे मिलती है
प्यासी जमीं से....तब बारिश को
उसकी आंखो की रोशनी मिलती है....
फिर शुरु होती है.... बारिश की नयी ज़िंदगी...
जो मिट्टी की खुशबू आती है बारिशों में...
दरअसल में वो मिट्टी की खुशबू नहीं....
बल्कि बारिशों की धडकने होती है....
जो मिट्टी से मिल जाती है...
और फिर सौंधी सौंधी खुशबू
सारे मंज़र में मिल जाती है.....
"प्यासी जमीं और उसपर अंधी बारिश की छिटें....
मौसम का करवट बदलना याद आता है....."
पिछले साल की बारिश याद आती है मुझे...
और मेरे मकान के सामने के वो हरे भरे
लहलहाते खेत मज़े से झुलते थे......
वो मंज़र याद आता है मुझे....
इस साल भी बारिश हुई..... मगर......
वो अंधी बुंदे उस बंज़र जमीं पर गिरी....
मगर इस बार बारिश को आंखो की रोशनी..........
न मिल पायी..........
बारिश अंधी आयी थी..... अंधी गिरी थी......
लडखडाती... गिरती....संभलती.... गिरे जा रही थी....
मगर उसे उसकी आंखो की रोशनी न मिल पायी....
इस साल उन खेतो की जगह......
आदमज़ात की प्यास ने ले ली थी......
हरी-भरी सांसो का गला घोंटकर.....
सिमेंट की जान डाली थी.....
वो सौंधी खुशबू इस बार नही आयी....
बारिश को नयी ज़िंदगी न मिल पायी....
अंधी बारिश.... उसके अंधे आंसु....
प्यासी आदमज़ात.....उसके प्यासे ख्वाब.....
बारिश इस बरस प्यासी ही रह गयी....
और आदमज़ात अंधी होती चली गयी....
----------आलमगीर.